सिंघाड़ा,,पानीफल,Water caltrops

 🌿#सिंघाड़ा,,पानीफल,Water caltrops



सिंघोडा  जलीय खाद्य,,,जीनस  Trapa की कुछ तीन प्रजाति मौजूदा पाई जाती हैं, उनमें से Trapa natans, औरTrapa bicornis, ज्यादातर है। और  Trapa rossica. लुप्तप्राय प्रजाति में गिना जाता है।


🌿आज बात कर रहे है,हम बहुत ही स्वादिस्ट ,पोस्टिक, और लगभग हमारे पूरे भारत मे होने वाली जलीय वनस्पति ,सिंघाड़ा,की,,जो तालाब की सतह पर तैरता हुवा जलीय पौधा है। यह एक लता की तरहः टेढ़ामेढ़ा फैलता है। पत्ते त्रिकोणाकार होते है। और इनमें सफेद  रंग के फूल खिलते है। प्रजाति के अनुसार फूल के रंग और फल का आकार देखने मिलते है।फूल पानी की सतह पर होते है। फूलो से फल बनने की प्रक्रिया होते ही  वजन बढ़ता है।और फिर फल पानी की सतह के नीचे चला जाता है। जैसे जमीन के अंदर कुछ वनस्पति के फल बनते है। इसी प्रकार इनके फल पानी के अंदर बनते है। यह फल ही इनका बीज है।पानी मे बनने वाला यह फल ,का एक नाम ,पानी फल ,भी है। ,वैसे मुजे तो यह एक कंदमूल ,की तरहः प्रतीत होता है। सिंघाड़ा को,"पानीकंद",,कहना भी योग्य होगा,!!😊 जड़ हरे ,सफेद, रंग की जो जल में डूबी हुई ,और दूर तक फैलती है।यह पूरा पौधा पानी मे तैरता रहता है। सिंघाड़े को उगने हेतु ,जलीय स्त्रोत में ,कीचड़ होना आवश्यक है। यह पूरी तरह प्राकृतिक है इन्हें किसीभी बाहरी रशायन दवाई या रसायनिक खाद की जरूरत नही।

🌿इसके फल पानी मे बढ़ते है। फल की उपरी सतह बहुत कठोर होती है। इनका आकर कुछ त्रिकोणीय, चपटे तथा (दोशिंगा)दो कोणों पर कंटकों से बने होते हैं। 

यह काटे चुभ,सकते ,बहुत देखकर निकाला जाता है।और कुछ यह कच्चा हरा,,लाल,ग़ुलाबी,

 (जब,बाजार मेंबिकते,है,तो,उन्हें,भूनकर,या पानीमेउबालकर बेचा जाता है।,तोफिर,एकदम काला दिखता है) सिंघाड़ा अंदर से एकदम स्वेत,सफेद होता है।


🌿मौसम अनुसार हर फल के फायदे खास होते हैं। पर सिंघाड़ा में प्रभु ने बहुत सारा पोस्टिक गुण दिए है। जो स्वास्थ्य वर्धक और बहुत सी बीमारी में लाभप्रद है। यह मधुर, ठंडे तासिर का फल है।  पित्त और वात को कम करता है।  कफ को हरने वाला, रूची बढ़ाने वाला,दस्त में बहुत फायदा देता है। पुरुषतत्व या सीमेन को बढ़ाता है। रक्तपित्त में लाभ देता है। तथा मोटापा कम करने में सहायक होता है। यह पोषण दायक है। ,दर्द भगाने वाला, बुखार कम करने वाला। भूख बढ़ाने वाला, सिंधड़ा के खाद्य उपयोग से कमजोर महिलावो  में शरीर सुडोल,बनता है। कमजोरी दूर करता है।तथा, वैद्यक में सिंघाड़ा शीतल, भारी कसैला वीर्यवर्द्घक, मलरोधक,तथा, रुधिरविकार और त्रिदोष को दूर करनेवाला कहा गया है। आयुर्वेदिक औषधियो में इनका उपयोग दूसरी जडीबियो के साथ जोड़कर बहुत सी बीमारी वो भगाने हेतु, हमारे भारत के,आयुर्वेदाचार्यो,, वैध जी करते है।

,,🌿,,,शारीरिक उपयोगी तत्व,

 कैल्शियम, जरूरी विटामिन्स,,-पोटैशियम, मैग्नीशियम और कॉपर,आयोडीन भी पाया जाता है। इसके अलावा इसमें पाए जाने वाले पॉलिफेनल्स और फ्लेवोनॉयड जैसे एंटी ऑक्सीडेंट एंटी-वायरल, एंटी बैक्टीरियल, एंटी कैंसर और एंटी फंगल फूड माने जाते हैं.

 🌿 स्थानिक लोग सिंघाड़ा को जल से निकाल कर बेचते है। इस तरह यह आजीविका भी प्रदान करता है। हमारे देशमें कई जगह सिंघाड़े की खेती भी होती है। होड़ी में बैठकर या पानिमे गोता लगाकर ,सिंघाड़े निकाल ते है। सिंघाड़े का पौधा उल्टा किया जाता है। फल काटकर फिर जलमे तैरता छोड़ दिया जाता है। सिंघाड़े के तलाब बहुत ही दलदलिय होते है। तालाबो से पानीके जंन्तु वो के बीच से सिंघाड़े निकाल ने वाले लोगो को नमस्कार करनेको जी चाहता है 🙏 उनकी महेनत से ऐसे पोस्टिक फल बड़े सहरो के बाजार तक उपलब्ध होते है।

🌿ज्यादा तर इसे पानीमे उबाल कर ,फिर उपयोग खाद्य व्यजनों में होता है। सिंघाड़ा को धूप में सुखाकर फिर  पीस कर आटा बनता है।आटे का उपयोग बहुत से भारतीय व्यंजनों में होता है। ज्यादातर  फलाहार,में सिंघाड़े के आटे से बहुत सारे व्यंजन बनाने में  उपयोग व्यापक प्रमाण में होता है।  सिंघाड़े की सब्जी,खीर,हलवा,मिठाई,बहुतकुछ बनता है।


🌿बताया जाता है कि इनके बीज 12 साल तक उगने हेतु बिगड़ते नही है। मतलब लंबे समय तक जीवित रहते है। ज्यादातर बीज 1 या 2 साल में वापश उग जाते है। इसतरह इनका कुदरती चक्र नए जन्म होते रहते है।

इसके अलावा सिंघाड़ा पर हमारे ग्रुप के ऐडमिन Pradip Patel   जी की एक लोकप्रिय पोस्ट ग्रुप पर है। उन्हें भी देखिए,,बहुत कुछ उपयोगी माहिती मिलेगी

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