विग्रह पूजा
मूर्ति पूजा
#विग्रह पूजा
स्टैचू
प्रतिमा
इत्यादि समानार्थक शब्द लग सकते हैं पर सबका अभिप्राय एक नहीं होता ।
संस्कृत भाषा में विशेष रूप से शब्दों को पारिभाषिक किया गया है । पारिभाषिक किया गया है अर्थात् उसकी परिभाषा करी गयी है जिससे के कुछ भी बकवास लोग न कर सकें ।
वेद में एक मंत्र आता है कि
“ न तस्य प्रतिमा अस्ति “
पुनः पढ़े “ न तस्य प्रतिमा अस्ति “ साधारण अनुवाद “उसकी प्रतिमा नहीं हो सकती । उसकी अर्थात् ईश्वर की ।
पर क्या यह साधारणीकरण उपयुक्त है ? नहीं ।
प्रतिमा का अर्थ क्या मूर्ति या विग्रह से है ? नहीं ।
प्रतिमा भी निरूक्त का पारिभाषिक शब्द है जिसका अभिप्राय उपमा देने से है । अर्थात् ईश्वर की उपमा किसी अन्य से नहीं हो सकती ।
अर्थात् ईश्वर की उपमा नहीं दी जा सकती वह उपमा से परे है ।
स्टैचू , प्रतिमा या बुत आप जिसका चाहें बना लें ।
बाबा अंबेडकर की बना लें
पिता गान्ही की बना लें
चचा नेरू की बना लें
स्टैचू ऑव युनिटी बना लें
जीजस जी की बना लें
या अन्य महापुरुषों की बना लें ..
उनका आदर करें या जो चाहे वो करें
पर वे शास्त्रोक्त रूप से पूजनीय नहीं हो सकते
हम मनुष्य पूजा नहीं करते
चाहे जीवित मनुष्य हो
या मुर्दा चाँद मियाँ
हम केवल पंच देवताओं, उनके अवतारों या अंशावतारों अथवा अपने घर में अपने इष्ट
अपने गाँव में ग्राम देवता / देवी
या कुल में कुल देवता / देवी की ही पूजा करते हैं ।
मेरे माता पिता, मेरे लिये पूज्य हैं सबके लिये नहीं ।
मेरे गुरू मेरे आराध्य हैं सबके नहीं ।
पुनः ध्यान दें जब हम मनुष्य की पूजा करते हैं ( जैसे विवाह के समय कन्या के पिता द्वारा वर के पाँव की पूजा ) उस समय भी वर में श्रीहरि नारायण का भाव करके हम वास्तव में नारायण की ही पूजा करते हैं ।
जिस प्रकार से मुर्दों की पूजा सामान्य हो रही है वह और कुछ नहीं विग्रह का अपमान है ।
सनातन हिन्दू धर्म का अपमान है ।
राम साक्षात परब्रह्म परमेश्वर हैं । वह अभिन्न निमित्तोपादान कारण हैं पर उनके पिता दशरथ हमारे आदरणीय हो सकते हैं परन्तु विग्रह के रूप में पूज्य नहीं ।
सनातन हिन्दू धर्म के विग्रह का साधारणीकरण न करें । राम केवल त्रेता की वस्तु नहीं बल्कि हमारे हृदय की वस्तु हैं और आज भी हैं । उनकी हर रामनवमी हमारे लिये
नित्य है
नूतन है
नवीन है
चिन्मय है ..
उन्हें इतिहास नहीं अपने हृदय की वस्तु बनायें ..
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